'मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं' - पाठ्यपुस्तकों की यह कविता पुरानी पीढ़ी के प्रत्येक सदस्य को अब तक ठीक से याद है। गांधी की इसी चादर को लेकर मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों हलचल मची हुई है! कांग्रेसी या भाजपाई, हर कोई इस चादर को ओढ़कर अब 'गांधीवादी' बनना चाहता है। दरअसल, मध्य प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र में किसी एक दिन की कार्यवाही को महात्मा गांधी के नाम समर्पित करने की तैयारी की जा रही है। राष्ट्रपिता के 150वीं जयंती वर्ष पर यह पहल कमलनाथ सरकार ने की है। सभी विधायकों के लिए एक दिन के ड्रेस कोड में होगा खादी का कुर्ता-पायजामा, साड़ी या सलवार-सूट। विधानसभा तक करीब 110 विधायकों के कपड़ों के नाप भी पहुंच गए हैं। आमतौर पर 02 अक्टूबर और 31 जनवरी, इन्हीं दो दिनों में गांधी-खादी ज्यादा याद किए जाते हैं। फिर अचानक बेमौसम बहार क्यों है? सवाल का जवाब तो बहुत आसान है, लेकिन उसके पीछे छुपे दर्शन को समझ पाना शायद थोड़ा कठिन हो। इसीलिए, सबसे पहले जवाब - गांधी के जरिए प्रदेश सरकार खादी के नवाचार को भी व्यापक रूप से जीवित करना चाहती है, मूल्यों-मान्यताओं के गांधी दर्शन पर भी फिर से संवाद करना चाहती है।
मध्य प्रदेश की राजनीति में भी संभवत: यह पहला अवसर होगा जब कांग्रेस, भाजपा, बसपा, निर्दलीय, प्रत्येक सदस्य का एक ही रंग, एक ही तरह का पहनावा (ड्रेस कोड) होगा - खादी। इसे लेकर विधानसभा अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के बीच पहले दौर की बातचीत भी हो चुकी है। प्रयास किया जा रहा है 17 दिसंबर से शुरू होने वाले विधानसभा के शीतकालीन सत्र में ही इस पर अमल हो। मध्य प्रदेश की राजनीति में यह प्रयोग अनूठा है। सियासी समीकरणों के जानकार भले ही इसे गांधी-समर्थन की होड़ कहें, लेकिन सभी दलों द्वारा 'गांधीवाद' को अपनाने की इस सोच का स्वागत होना चाहिए और इसी बहाने खादी के प्रचार-प्रसार-प्रभाव का भी समर्थन किया जाना चाहिए।
मध्य प्रदेश से खादी का नाता बहुत गहरा न सही, लेकिन कमजोर भी नहीं रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मध्य प्रदेश में हजारों लोगों ने इसे अपनाया। हालांकि कालांतर में उत्पादन और उपयोग कम हो गया। देश के 13 राज्यों में मुख्य रूप से खादी का कच्चा माल तैयार होता है। बंगाल, बिहार, ओडिशा और उत्तर-पूर्वी राज्यों से रेशमी माल प्राप्त किया जाता है, जबकि कपास आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल से मिलता है। पॉली खादी को गुजरात और राजस्थान में काता जाता है, जबकि हरियाणा, हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर को ऊनी खादी के लिए पहचाना जाता है।